Udaas Mun....
उदास मन
रुके से पर—-फिर भी
किसी अनजान सफर पे
बढ़ते हुए कदम—-
थके हुए पर—-फिर भी
आहिस्ता आहिस्ता
उठते हुए कदम—-
अनचाही मंज़िल, दुश्वार रास्ते
—-पर फिर भी न
रुकते हुए कदम—-
कहाँ जाना है, क्यों जाना है
नहीं मालूम, फिर भी न जाने
कहाँ ले जा रहे हैं कदम—-
पहले तो हर किसी ने छोड़ दिया
हमारा साथ, और अब बेवफाई
कर रहे हैं कदम—-
चल तो रहे हैं, पर हैरान हैं हम
आखिर क्यों नहीं रुक पा रहे
यह दिशाहीन कदम—-
ना कुछ खोने का डर है
ना पानी की हसरत, तो फिर
क्यों चले जा रहे हैं हम—-
कुछ पानी की कशिश में
बहुत कुछ खो चुके हैं—
फिर इस सफर में जाने क्या
खोजते हैं हम—-
कुन ये सूनी आँखें हैं नम—
दुनियादारी में है, पर दुनिया
का नहीं—
भीड़ में है, पर तनहा है—
भरा हुआ है, फिर भी खाली है—
जाने क्या चाहता है——-“यह उदास मन।
- शिवानी 'नरेंद्र' निर्मोही
